रांची । झारखंड की पहचान संस्कृति और पारंपरिक जीवन से जुड़े झारखंड के मांदर को भारत सरकार की ज्योग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री चेन्नई ने ज्योग्राफिकल इंडिकेशन यानी जीआई टैग का दर्जा प्रदान कर दिया है । पारंपरिक लोक वाद्य के रूप में मांदर की अपनी विशिष्ट पहचान है । यह राज्य की परंपरा नृत्य और सांस्कृतिक जीवन से जुड़ा हुआ है । मालूम हो कि इसके पूर्व सोहराय खोवर चित्रकला और कोडरमा जिले के केसरिया कलाकंद को भी जीआई टैग मिल चुका है। मांदर को भौगोलिक संकेतक का दर्जा दिलाने की पूरी प्रक्रिया में डॉक्टर सत्यदीप सिंह एवं राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय रांची के विजिटिंग फैकल्टी ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । डॉक्टर सत्यदीप सिंह झारखंड की पारंपरिक कला और उत्पादों को भौगोलिक संकेत के रूप में पहचान दिलाने में लगातार प्रयास करते रहें है। उन्होंने इसके पहले झारखंड की सोहराय खोवर चित्रकला को भौगोलिक संकेतक का दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । यह झारखंड का पहला भौगोलिक संकेतक बना था । इसके बाद कोडरमा के केसरिया कलाकंद को भौगोलिक संकेतक का दर्जा दिलाने की प्रक्रिया में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । भौगोलिक संकेतक का दर्जा दिलाने की प्रक्रिया में गुमला के तत्कालीन उपायुक्त करण सत्यार्थी की भी सक्रिय भूमिका रही । मुख्यमंत्री लघु कुटीर उद्यम विकास बोर्ड तथा गुमला जिला समन्वयक सूरज कुमार का भी सहयोग रहा है । मांदर को भौगोलिक संकेतक का दर्जा मिलना झारखंड की लोक संस्कृति पारंपरिक ज्ञान शिल्प कौशल और कारीगरों की विरासत को नई पहचान मिली है और यह एक बड़ी उपलब्धि है।



