रांची। पितृपक्ष रविवार 27 सितम्बर से शुरू हो गया है। यह क्वार माह की प्रतिपदा से शुरू होकर अमावस्या तक चलेगा। कहा जाता है कि श्राद्ध की परंपरा रामायण व महाभारत काल से चली आ रही है।
इस संबंध में पंडित अमलेश चंद्र मिश्रा का कहना है कि प्रतिपक्ष के दौरान पितर धरती पर आते हैं। जल और भोजन ग्रहण करने के लिए। देव और ऋषि तर्पण में पूरब दिशा कि ओर मुंह करके जनेऊ को सव्य रखें दाहिना घुटना जमीन पर लगाकर बैठे। दिव्य मनुष्य में उत्तर दिशा कि ओर करें जनेऊ को माला कि तरह करलें । और दिव्य पितृ में दक्षिण दिशा कि ओर मुंह करलें जनेऊ को अपसव्य हो जाय(जनेऊ को दाहिने कंधे पर)। मालूम हो कि इस वर्ष गयाजी में पितृपक्ष मेला की शुरुआत 25 सितम्बर से ही हो चुकी है। इस वर्ष शरद कर्म की तिथियां है।

27 सितम्बर दिन रविवार को प्रतिपदा श्राद्ध। 28 सितम्बर दिन सोमवार को द्वितीया श्राद्ध। 29 सितम्बर दिन मंगलवार को तृतीया श्राद्ध। 30 सितम्बर दिन बुधवार को चतुर्थी श्राद्ध। एक अक्टूबर दिन गुरुवार को पञ्चम श्राद्ध। दो अक्तूबर दिन शुक्रवार को षष्टी श्राद्ध। तीन अक्तूबर दिन शनिवार को सप्तमी श्राद्ध। चार अक्तूबर दिन रविवार को अष्टमी व नवमी श्राद्ध। पांच अक्तूबर दिन सोमवार को दशमी श्राद्ध। 6 अक्टूबर दिन मंगलवार को एकादशी श्राद्ध। 7 अक्टूबर दिन बुधवार को द्वादशी श्राद्ध। 8 अक्टूबर दिन गुरुवार को त्रयोदशी श्राद्ध। 9 अक्टूबर दिन शुक्रवार को चतुर्दशी श्राद्ध है। वहीं 10 अक्तूबर दिन शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या को पितृविसर्जन यानि महालया का समापन हो जायेगा। वहीं पंडित जी का कहना है कि जिन्हें अपने पूर्वजों की तिथि ज्ञात है वे उसी तिथि को श्राद्ध करना चाहिए। अगर पूर्वजों की तिथि ज्ञात नहीं है वे 10 अक्तूबर दिन शनिवार अमावस्या के दिन श्राद्ध करना शास्त्र सम्मत माना जाता है।



