, प्रकृति से जुड़ा पर्व है करम
रांची। प्रकृति से जुड़ा पर्व है करम । जैसे जिंदा रहने के लिए हवा की आवश्यकता होती है । और हवा वृक्ष के द्वारा प्राप्त होता है। वृक्षो को आदिवासी समाज पूजा करते है और पर्यावरण की रक्षा भी समाज के हाथो ही होती है। यह बातें केंद्रीय सरना संघर्ष समिति के अध्यक्ष शिवा कच्छप ने बताया। उन्होंने कहा कि करम पर्व के दौरान करम डाली काटकर उसे देवी मंडप लेकर पहुंचते है फिर अखरा में लाते है। करम देव को गांव के महतो द्वारा गाड़ा जाता है। फिर गीत गाते है, करम गाइड दे रे महतो। अखरा को रंग बिरंगे फूल, पत्ती से सजाते है, पूजा आरंभ होने पर उपवास पर रहे लड़का – लड़की करम दउरा या थाली में पूजा सामग्री लेकर पहुंचते है। उसमें तेल, सिन्दूर, धूप, दीया,खीरा, चीउडा आदि कहानी पहान द्वारा सुनया जाता है। दीपक के तेल लौ को पेचकी के पते से ढक कर अखरा लाया जाता है, फिर सभी लोग करमदेव के चारो ओर बैठ जाते है, वही करम अखरा में चारो ओर भेलवा, सखुआ आदि लाकर खड़ा कर दिया जाता है, आस्था के बाद सुकून भरे पल में लोग शालीनता पूर्वक पूर्वजो की कहानी सुनते है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रो में करम पूजा में इस तरह के विशुद्ध झारखंडी संस्कृति की झलक देखने को मिलता है। दशक पूर्व तक करम पर्व के अवसर पर कही भी गाजा बाजा एवं दिखावे की संस्कृति नही थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षो से कई जगहो में ऐसे अखरा मिल जाएंगे। जहां युवा युवक – युवतियो आधुनिक डीजे के धुन पर नृत्य करते हुए नजर आ जाएंगे । करम पर्व सादियो से मनाई जा रही है। इस पर्व के गीत – झूमर एवं अखरा को बचाने में लोक कलाकारो से लेकर हर समाज के लोगो ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है । इसलिए करम पर्व की मूल संस्कृति झारखंडी कला गीत – नृत्य को बचाए रखना है।








