बिहार के मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, जारी किया नोटिस

New Delhi: बिहार सरकार के पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश की नियुक्ति को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई के बाद शीर्ष अदालत ने दीपक प्रकाश, बिहार सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है।

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान यह जानना चाहा कि क्या दीपक प्रकाश वर्तमान में मंत्री पद पर बने हुए हैं। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने पुष्टि की कि वह अभी भी मंत्री के रूप में कार्यरत हैं।

याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि दीपक प्रकाश न तो बिहार विधानसभा के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद के, इसके बावजूद उन्हें लगातार दूसरी बार मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई है। याचिका में इसे संविधान की भावना और लोकतांत्रिक व्यवस्था के विरुद्ध बताया गया है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सुदीप चंद्र ने अदालत को बताया कि बिहार विधानसभा चुनाव के बाद 20 नवंबर 2025 को मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद तत्कालीन सरकार ने दीपक प्रकाश को पंचायती राज मंत्री नियुक्त किया था। वह 15 अप्रैल 2026 तक इस पद पर बने रहे।

बाद में राज्य में राजनीतिक बदलाव के बाद नई सरकार का गठन हुआ और सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने। इसके पश्चात 7 मई 2026 को दीपक प्रकाश को एक बार फिर पंचायती राज मंत्री बनाया गया। याचिकाकर्ता का दावा है कि यह नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 164(4) की भावना के विपरीत है, क्योंकि कोई व्यक्ति सीमित अवधि तक मंत्री रहने के बाद इस्तीफा देकर पुनः मंत्री पद हासिल नहीं कर सकता।

याचिका में यह भी कहा गया है कि दीपक प्रकाश को इस बार विधान परिषद सदस्य बनाने के लिए भी नामित नहीं किया गया है। ऐसे में उनकी नियुक्ति की संवैधानिक वैधता पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

याचिकाकर्ता ने अदालत से ‘क्वो वारंटो’ (अधिकार-पृच्छा) रिट जारी करने की मांग की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि दीपक प्रकाश किस संवैधानिक अधिकार के आधार पर मंत्री पद पर बने हुए हैं। साथ ही, उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान लिए गए प्रशासनिक फैसलों, पारित योजनाओं तथा वेतन-भत्तों की वैधता पर भी सवाल उठाए गए हैं।

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों से जवाब मांगा है। अब इस मामले की अगली सुनवाई में अदालत के समक्ष नियुक्ति की संवैधानिक वैधता और अनुच्छेद 164(4) की व्याख्या महत्वपूर्ण मुद्दे रहेंगे।

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